माँ का घर (पुनः अवलोकन)

This is for you Yasmin.

यह बचपन का घर नहीं,

जहाँ मैं थी पली- बढ़ी

न ही मैं यहाँ गुड्डे-गुड़िया संग खेली

विदा न हुई इस घर से मैं

पर जहाँ माँ रहे, मायका है वहीं ।

जब माँ-बाबूजी यहाँ आकर बसे

तो मेरी यादों की पोटली साथ ले आए।

यहाँ मेरा वो वाला कमरा तो नही,

पर घर की हर चीज़

मुझे बचपन से जोड़े ।

मेरे कदम जब यहाँ पड़ते हैं

रूह को सुकून सा मिलता है

वो आम का पेड़ यहाँ तो नही

पर फूलों की क्यारियाँ वैसी ही हैं।

रसोई से खाने की महक है वैसी ही

मेरे बचपन में होती जैसे थी

चाहे मैं जवान बच्चों की माँ हूँ

मैं लाडो हूँ माँ -बाबूजी की।

मेरा वजन जो बढ़ता ही जा रहा है

इनको वह नही दिखता है

हर बार इनकी बूढ़ी आँखों को

मैं और कमजोर सी दिखती हूँ ।

यहाँ मैं स्वछन्द परिन्दे सी

विचरूँ इधर-उधर बन तितली

ससुराल की बेड़ियों से परे

मैं यहाँ हूँ सिर्फ घर की बेटी ।

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14 thoughts on “माँ का घर (पुनः अवलोकन)

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