चुप्पी (पुनः अवलोकन)

मैं व्यस्त तो नही, पर व्यस्तता का लबादा ओढ़ लेता हूँ,

दोस्तों से मिलने की चाहत को अकसर मैं छोड़ देता हूँ

तुम से बातें करना मैं दिल से चाहता हूँ

पर क्या करूँ, मन को मैं बस यूँही मसोस लेता हूँ।

यह नही कि मेरे पास वक्त नही है

न ही बात न करने की कोई वजह है

बस अपनी असलियत जाहिर होने से डरता हूँ

मैं चुपचाप तन्हाई से खुद को जोड़ लेता हूँ।

कहने को मेरे पास बहुत कुछ है

तुम्हारी सुनने की चाहत भी बेहद है

पर न जाने क्यों मैं आगे बढ़ने से रुक जाता हूँ

एक कदम आगे चल, दो कदम पीछे हो लेता हूँ ।

कहीं तुम मेरी बातों से नाराज न हो जाओ

मेरे दिल की बात सुनकर ख़फा न हो जाओ

मैं इस डर को दिल से निकालना चाहता हूँ

पर न जाने क्यों ऐसा न कर पाता हूँ ।

कहते हैं, यह साथ पल दो पल का है

जिंदगी का भरोसा न आज, न कल का है

मैं फिर भी कल के इंतजार में ही रहता हूँ

मैं न जाने क्यों आज को कल पर छोड़ देता हूँ।

अगर कल न आया, तो न जाने क्या हो

जो बात कहनी थी, वो न कह पाया, तो क्या हो

इसलिए आज मैं यह इकरार करता हूँ

मैं आज अपनी यह चुप्पी तोड़ लेता हूँ।

16 thoughts on “चुप्पी (पुनः अवलोकन)

    1. Awww! That’s great. I always feel awful when I post in Hindi because then most of the readers can’t enjoy the poem. It’s wonderful that you could translate it. Thank you so much for the read.

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  1. Such a beautiful mix of sadness in the silence and hope in the breaking of it. I guess writing is one way to break any silence, even before words are spoken. I imagine I’ve lost a lot in translation but hope I gained the sentiment.

    Liked by 1 person

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