कुछ नही बदलता

बदलता है रोज दमकता दिन, गहरी रात में,

अगली सुबह चमचमाता फिर आ जाता है।

काली स्याह रात पौ फटते ही लुप्त हो जाए,

अगली शाम फिर श्याम आँचल लहराती आती है।

कहते हैं सब, बदलाव आता है,

पर कुछ नही बदलता है।

बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापा,

बुढ़ापे से फिर हम बचपन में जाते हैं।

छोटे,सस्ते खिलौनों से खेलते-खेलते,

हम महंगे और बड़े खिलौनों से खेलने लग जातें हैं।

कहते हैं सब, बदलाव आता है,

पर कुछ नही बदलता है।

सरकारें आती हैं और चली जाती हैं सरकारें,

आम लोगों की तकलीफें जस की तस रह जातीं हैं।

देश को बदलने का नारा सब देते हैं,

पर आदतें अपनी बदलने से सब हिचकिचाते हैं।

कहते हैं सब, बदलाव आता है,

पर कुछ नही बदलता है।

जुल्म ढाने वाला जुल्म ढाता है,

सहने वाला सहता ही जाता है।

शायद कल कुछ बदल जाए

इस सोच में ही जीवन खत्म हो जाता है।

कहते हैं सब, बदलाव आता है,

पर कुछ नही बदलता है।

दूसरों को सलाह सब देते हैं,

सलाह दूसरों की कौन मानता है!

खुद को बदलने का वादा खुद से रोज होता है

खुद को बदलना इतना आसान कहाँ होता है।

कहते हैं सब, बदलाव आता है,

कुछ नही बदलता है ।

जो जैसा है, वैसा ही रहेगा यह मान के चलो,

अपनी विचारधारा में दूसरों को कौन ढाल सका है!

किसी के कहने पर कौन चलता है,

सत्य को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है।

यूँ लगता है, बदलाव आ रहा है,

पर सच तो यह है कुछ नही बदलता है।

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