मेरा हमदम

बचपन से अब तक, जो था साथ मेरे 

अंधेरी रातों में दानवों को भगाया जिसने

मुझ पर नींद की गहरी चादर ओढ़ाई उसने

मेरी नींद को दिए जिसने मीठे  सपने 

और फिर उन सपनों में सतरंग भरे

जो मेरे थके सर को अपनी आगोश में ले ले

मेरी तन्हाई में मुझे सीने से लगा ले

और जब मैं हूँ सोच में, तो गोद में लेट जाए चुपके से

सर्द रातों को जिसे लगा लूँ मैं गले से

जो मेरे आँसुओं को रात के अंधेरे में जज्ब कर ले

मेरी सिसकियों को अपने सीने में दफन कर ले

और गुस्से में जो दो चार लातें भी खा ले

फिर भी उफ न करे न ही आह भरे

मेरे दुख – सुख  का सदा साथी बना रहे

वो और कोई नही, मेरा तकिया ही है

खुशी के पल हों या हों गम के

मेरा साथी, मेरा हमदम मेरा तकिया ही है।

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तारीख 

मैं आज हूँ, बस आज ही हूँ 

कल मेरी जगह कोई और होगा

बहुत कुछ नया सा होगा

कुछ पहले जैसा ही होगा

मैं आज ही, बस आज ही।

कहीं जन्म होगा, तो कहीं मरण,

कहीं नया अध्याय, कहीं अंतिम चरण 

किसी के लिए मैं बेश्किमती

किसी के लिए दुख की घड़ी

  मैं आज ही, बस आज ही।

मेरा इंतजार कोई शिद्दत से करे

कोई मुझे भूल मुश्किल में पड़े

किसी का मैं नुकसान हूँ 

मैं किसी का फायदा भी हूँ 

मैं आज ही, बस आज ही।

जब बीत जाऊँ, तो याद बन जाऊँ 

कल, आज से कल में तब्दील हो जाऊँ 

तारीख बन कर पंचांग की

हर साल फिर खुद को दोहराऊँ।

मैं आज ही, बस आज ही।

यही हूँ मैं

यह सच है कि कुछ बदल गई हूँ मैं

उम्र बढ़ने पर अब ढल गई हूँ मैं 

हाँ, यह सच है कि बालों की चाँदी छिपाती हूँ मैं

लड़की से औरत बन गई हूँ मैं।

सबको किसी तरह संभाला के रखा मैंने

खुद को संभालने का वक्त आया तो फैल गई हूँ मैं 

अपनी जरूरतों को जोर शोर से पूरा करती हूँ मैं 

क्योंकि स्वावलंबी बन गई हूँ मैं।

रिश्तों को निभाने की पूरी कोशिश करती हूँ मैं

जो न निभे उनका रंज अब नही मैं करती

खुद को धरती समझा ही नही कभी मैंने 

इसलिए बेवजह का बोझ ढोती ही नही मैं ।

सलाहें अब खूब देती हूँ मैं

चाहे स्थिति समझ के बाहर हो, चुप नही रहती हूँ मैं

ज्ञान अपना बेहिचक बाँटती हूँ मैं

खुद को पहले से बेहतर समझने लगी हूँ मैं ।

सासू जी को सास ही मानती हूँ मैं 

हर माँ सास बनने का सपना ही देखे

बेटी वे मानती नही, तो बहू ही रही हूँ मैं

वो भी खुश हैं और खुश रहने लगी हूँ मैं।

तोल- भाव करना मैंने अब छोड़ दिया

जो कमाया है,यहीं लुटा के जाना है, सोच लिया

इसलिए खुद पर खर्चने लगी हूँ मैं 

अपनी सारी हसरतें पूरी करने लगी हूँ मैं ।

बच्चों को रखती हूँ  अभी भी अंकुश में

डाँटना-चिल्लाना तो कब का मैंने छोड़ दिया 

नजरों से उनको अनुशासित करती हूँ मैं

माँ हूँ, यह कभी उन्हें भूलने न देती हूँ मैं ।

जानती हूँ खुद को सँवारना-निखारना

आत्मा पर मैल चढ़ने न देती हूँ मैं

पहले से अब ज्यादा निखर गई हूँ मैं

क्योंकि खुद की आलोचक बन गई हूँ मैं।

सहेलियों के साथ मैं वक्त हूँ गुजारती

शरीर के साथ आत्मा का सृजन भी हूँ करती 

माँ -बाप के बुढ़ापे का सहारा बन रही हूँ मैं

अपनी जिंदगी की कविता खुद लिख रही हूँ मैं ।

हर नए दिन को चुनौती देती हूँ मैं

वक्त को साथ लेकर चल रही हूँ मैं

चाल चाहे मस्त हाथी सी हो गई हो मेरी

जमीन से सदा जुड़ी रही हूँ मैं।

खुद से पहचान तो बहुत पहले से थी

खुद को अब प्यार करने लगी हूँ मैं।

Dilemma Before Reunion

What should I wear 

oh! what should I wear

I am meeting friends after thirty and five years

I want to look my best

So I don’t show my fifty years!
Should I dress traditional

Or the typical working woman

Or something in fusion

What if I dress bohemian?
Should I wear my hair up

Or let it down

Maybe it would look better

If I colour it brown.
Now how about jewellery

Ethnic silver type?

If I wear diamonds

Will I be show- off type?
So many decisions

I am in a quandary now

A little voice in my head says

Come on, its friends’ pow wow.
So I will not fret any more

Whatever I have, will wear

And if I look frumpy

No one will actually care! 

माँ का घर 

यह बचपन का घर नहीं, जहाँ मैं थी पली- बढ़ी 

न ही मैं यहाँ गुड्डे-गुड़िया संग खेली

विदा न हुई इस घर से मैं

पर जहाँ माँ रहे, मायका है वहीं ।

जब माँ-बाबूजी यहाँ आकर बसे

तो मेरी यादों की पोटली साथ ले आए। 

यहाँ मेरा वो वाला कमरा तो नही,

पर घर की हर चीज़ मुझे बचपन से जोड़े ।

मेरे कदम जब यहाँ पड़ते हैं

रूह को सुकून सा मिलता है

वो आम का पेड़ यहाँ तो नही

पर फूलों की क्यारियाँ वैसी ही हैं।

रसोई से खाने की महक है वैसी ही

मेरे बचपन में होती जैसे थी

चाहे मैं जवान बच्चों की माँ हूँ 

मैं लाडो हूँ  माँ -बाबूजी की।

मेरा वजन जो बढ़ता ही जा रहा है 

इनको वह नही दिखता है

हर बार इनकी बूढ़ी आँखों को

मैं और कमजोर सी दिखती हूँ ।

यहाँ मैं स्वछन्द परिन्दे सी

विचरूँ इधर-उधर बन तितली

ससुराल की बेड़ियों से परे

मैं यहाँ हूँ सिर्फ घर की बेटी ।

यहाँ आज भी मेरी हुकूमत है

भाभी भी मेरा लाड़ करती है

भाई से अभी भी लड़ती हूँ 

इस घर पर मेरा पूरा हक है।

बेफिक्री के यह कुछ दिन

स्फूर्ति से भर दे मेरा तन-मन

दायित्व सारे सँभालू मैं

फिर बहू-पत्नी-माँ बन।

To Father

A eulogy for Fr.  John Moore, founder principal of our school and a much respected and beloved soul on his birth centenary on 5th Aug.

The most abiding memory of school time,

Is the one with Father Moore in his habit,

Surrounded by a gaggle of five year olds

Vying to hold his hand 

For a walk during recess.

A white man, in a white robe

With white curls creating a halo,

Twinkling blue eyes and a beatific smile,

He was every child’s angel.

Sitting in his office in shirt sleeves

Smoking his pipe

And gently reprimanding miscreants,

He was truly indeed a father figure.

By the time we were grown up enough

To really interact with him

He had moved on.

Leaving behind innumerable heartwarming anecdotes

Of how he touched and changed many a lives.

If his spirit is looking down at us

It would surely be delighted to see

His ideals, his principles and his beliefs 

Embodied by so many Xaverians.

As for me, 

One of my most cherished possession forever will be,

My report card with his handwritten personal remark.

Dear Friends

Once a year it’s time

To show gratitude to all friends

So a big thank you goes out…

To the one who unfailingly wishes good mornings,

The one who posts ominous warnings,

The one who posts inspirational quotes,

The one who never forgets to share jokes,

The one who posts thoughtful gems occasionally,

The one who encourages all enthusiastically,

The one who posts obsessively and compulsively,

The one who remembers to post only sporadically,

The one who prefers to be just quiet,

The one who is such a zany laugh riot,

The one who advances and then retreats,

The one who occasionally drops in to greet,

The one who is always there to applaud,

The one who always posts about god,

The one whose amazing wit shines and sparkles,

The one whose continued silence rankles,

The one who offers an honest critique,

The one who is always painstakingly discreet,

The one who is there throughout the year,

The one who quietly, without fanfare likes to disappear,

The one who is still up at night posting,

The one who gets angry at ceaseless posting,

The one who is always brimming with love,

The one who is angry with the one above,

The one who often stentoriously censures,

The one whose posts need some inbuilt censors,

The one who thoughtfully curates meaningful posts,

The one who spreads joy through musical notes,

The one whose passion for nature is worth emulating,

The one whose photography is breathtaking,

The one who tickles with his/her view of the world,

The one who fills me with awe with his/ her words,

The one who is a veritable mine of knowledge

The one whose talent must be acknowledged,

The one whose life revolves only around love,

The one who is philosophical about not finding love,

The one who I might have forgotten to mention,

The one who might defy all definition,

The one who is like a mirror and shows all my warts

And the one like my shadow, who never thwarts,

Each one of you is unique and so special

No wonder you make my life extra special.

Thank you.