My Daughter is Growing Up

I see her surreptitiously glancing at herself in the mirror,

Fussing over her clothes like never before.

Fretting at every fresh breakout of acne

Combing her hair over and more.

Her chats on phone are increasingly unending,

Her baths continue, till I am ready to break the door.

From cartoons she has transitioned to rom-com movies,

Her taste in music is what every mother abhors.

She is moody and uncommunicative,

Her sighs and moans are hard to ignore.

She sits alone, smiling dreamily

Studies have become an avoidable chore.

Goes moony- eyed watching her favourite actor

Her father is her hero no more.

Her mom is frumpy, not keeping up with times,

Her brother a pain,family get-togethers such a bore.

My only fear is she is too young to fall in love.

What if she gets entangled in the web of lovelore

Will I be a bystander, watching her heartbreak?

Should I not forbid her to stay away from amour?

As I watch my sweet, quiet child metamorphosis,

I think of the bygone time of yore

When I too transformed from a child to teenager

And wonder if I too gave my mom heartsore.

I know it will pass and my personable child will be back

Till then, I must seal my lips and not deplore

For teenage comes once in a lifetime

I have to allow her space to self explore.

Advertisements

आजकल औरतें…

डा.ज्योत्सना मिश्रा से माफी चाहते हुए, यह कविता पेश करने की जुर्रत कर रही हूँ ।

आजकल औरतें अजीब नही होतीं हैं,

मर्दों से झूझते-झूझते कुछ ढीठ सी हो गईं हैं।

जिंदगी का लेखा जोखा भूल

अपनी पहचान तलाशतीं हैं।

रात को जब थक कर 

टी वी देखने बैठतीं हैं,

तब न बच्चों की चादर,

न दरवाजों की कुंडियाँ,

न ही पति का मन टटोलती हैं।

बल्कि अॉफिस का कामकाज,

बाई की छुट्टी,

और टिफिन की उधेड़बुन में रहतीं हैं।

अलार्म की आवाज पर अलसाई सी उठतीं हैं,

आजकल औरतें अजीब नहीं होतीं हैं ।

हवा की तरह अंदर बाहर आज भी घूमतीं हैं

पर न टिफिन में कविता है, 

न गमलों में आशा खुद बोती हैं।

बाई और माली को सौंप यह काम,

 खुद से पहचान करने के लिए,

अंग्रेज़ी धुन गुनगुनाती निकल पड़तीं हैं।

उन्हीं सीमाओं में बंधी हैं

पर अब उनसे सीमित नहीं हैं,

अब कभी सहेलियों के साथ है कॉफी और कभी विपास्सना,

सब से दूर होकर खुद को ढूँढतींं हैं।

डाक्टर साहिबा,  आजकल की औरतें अजीब नही होतीं हैं।


अपने ख्वाबों को खुद पूरा करतीं हैं

मोजे,पेन्सिल,किताब, गुड़िया ढूँढते हुए भी काम सब करतीं हैं

बचपन की यादें साथ संजोये, निरंतर आगे बढ़तीं हैं

फिर भी झिड़कियाँ आज भी खातीं हैं।

शौक पूरे करतीं हैं,

मर-मर कर नहीं जीतीं है 

काम सारे ढंग से करतीं हैं,

पर शायद, औरतें कुछ अजीब होतीं हैं।

न शरीर पर नील पड़ने देतीं हैं,

न रूह पर चोट,

ईंट का जवाब पत्थर से देतीं हैं ।

कपड़ों के लिए किसी पर मोहताज नही हैं,

टूटी फटी चीजें, बातें हैं अतीत की हैं।

सच है,दिन आज भी शहादत में ही गुजरता है

और रातें फिर से सलीब होतीं हैं,

फिर भी, औरतें इतनी भी अजीब नहीं  होतीं हैं।

सूखे मौसम में आज भी बारिश को तरसतीं हैं ,

 हथेलियों में आज भी तितलियाँ संजोतीं हैं,

और जब बूंदे सचमुच बरसतीं हैं,

हवाएँ गुनगुनातीं हैं और फिजाएँ खिलखिलातीं हैं,

तो ये जी भर कर बारिशों में भीगतीं हैं।

औरतें इतनी भी अजीब तो नही होतीं हैं।

आज भी खुशी के आश्वासन पर सारा जीवन काट देतीं हैं,

अनगिनत खाईयों को अनगिनत पुलों से पाट देतीं हैं

इसीलिए औरतें अजीब नहीं होतीं हैं ।

रस्मों को रिवाजों  को आज भी मानतीं हैं,

जिंदगी की आँख से थोड़ा -थोड़ा झरती है,

अपने तौर पर अब जीने लगी हैं

शायद इसीलिए औरतें अब अजीब नहीं होतीं हैं।

तुम

पेड़ों की  धीमी सरसराहट

तुम्हारी आवाज की तरह

मेरे कानों में सरगोशियाँ करें।

लहरों की ठंडी अठखेलियाँ

तुम्हारी उँगलियों की तरह

मेरे पैरों पे गुदगुदियाँ करें।

हवा के ये महकते झोंके

तुम्हारी खुशबू की तरह

मुझे मदहोश कर दें।

सर्दियों की सुनहरी धूप

तुम्हारे आलिंगन की तरह 

मुझे बाँहों में भर ले।

बारिश की मीठी फुहार

तुम्हारे चुम्बन की तरह

मेरा तन-मन भीगो दे।

गर्मियों की तपती शामें

तुम्हारी चाहत की तरह

मुझे ज्वलंत कर दें।

तुम जब मेरे करीब न रहो

सारी कायनात

और तुम्हारी यादों के साये

मेरी रातों को और गहरा दें।