The Queue 

As I stand in the snaking queue
Rubbing shoulders with the hoi poi

I wonder where is who’s who

Hiding their ill gotten money!

Everyone has a tale to share,

Everyone has an opinion to air.

Some are armed with sustenance,

For others it is no less than penance.

The hoarders are paying the price,

The honest are paying other’s price.

In the name of the good of the nation,

Citizens face harsh conditions.

Who knows when the woes would end?

Who knows if black money will end?

The mantra is ‘no pain no gain’

Because to complain will go in vain.

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The Endless Wait

href=”https://dailypost.wordpress.com/prompts/patience/”>Patience</a&gt;

She sat on the stairs

Clutching her teddy

Her eyes on the road

Waiting for daddy.

Her eyes wandered around

A sea of faces around her swarmed

Her school bag heavy with books

Frightened, she waited for her mom.

As she played in the park

Her gaze fixed on the gate

She participated listlessly

All the while in best friend’s wait.

She paced restlessly in the college campus

Glancing every then and now at her watch

He was late as usual to pick her up

She waited for the one who was her perfect match.

It was later than usual office timing

She sat resignedly on the armchair

It was becoming a habit of late

To wait for her husband but it was difficult to bear.

It was already time for kids to return

But she could hear no footsteps outside

Her ears strained to hear their voices

As she sat waiting for the apples of her eyes.

She stood in the balcony, as if carved out of wood

He was late yet again in spite of warning

She knew not what she could do

To straighten her son, who was erring.

And so it went on like this for her

Till on her deathbed one day she lay

Everyone prayed for her pain to end

But she knew she would have to wait for another day.

सब्ज़ी वाले की गाथा 


मैं क्या जानू कौन है नक्सल

कौन है आतंकी कैसे पहचानू

रोज़ कमाऊँ रोज़ खाऊँ 

अब रोजी छोड़ रोज़ लाइन लगाऊँ?

बापू बीमार गाँव में पड़े हैं

घरवाली प्रसव से है

मैं यहाँ से न कुछ कर पाऊँ

पैसे कैसे उन तक पहुँचाऊँ?

पढ़ा लिखा हूँ मैं नही, 

राजनीति मैं नही समझता

कितने दिन उधार करूँगा 

ऐसे तो भूखों मरूँगा।

मेरे पास कहाँ काला धन है?

बैंक में मेरा खाता नही है

 मैं कितनी परेशानी झेलूँ

 कहाँ, कैसे पैसे मैं बदलूँ?

चाहे किसी की नकेल कसो

या फिर तुम जेल भरो

मेहनत के पैसै दिला दो

बस मेरी तकलीफ मिटा  दो।

नोटबंदी

लाइन में खड़ा हूँ छोड़ नौकरी 

करता हूँ अब न कोई चाकरी,

जब तक मेरी आए बारी,

बैंक कहे, नगदी बंट गई सारी।

प्राईवेट बैंक हो या सहकारी 

सबके द्वार खड़ी जनता दुखियारी 

सरकार कहे बस कुछ दिन हैं भारी

साथ दो हमारा बनके आज्ञाकारी।

न मैं तस्कर, न मैं व्यापारी 

 न ही हूँ मैं नौकर सरकारी

काले धन की विपदा सारी

सारा देश करे तपस्या भारी।

माना समस्या थी दुष्कारी

निदान क्यों कर किया दोधारी 

मरे तो मरे काला धन व्यापारी 

क्या गलत है देश की जनता सारी?

न कोई दे एडवांस, न ही उधारी

बैरी बन गई दुनिया सारी

अपने ही पैसों के लिए मारा मारी

हे भगवान! मैं तो बन गया भिखारी!

यह कदम तो है हाहाकारी

चाहे कुछ लोग करें जयजयकारी

काश की सरकार होती परोपकारी 

 क्यूँ  कर बन गई वो अत्याचारी?

Life

I am the enigma that has you confused,

I am the chimera that has you bemused,

I entice you, I delude you

In your fancies I seduce you.

I am your mentor though you think otherwise

You try your best on your own to rise

You wish me away as you fear my hold,

You shun me at times for you find me bold

You hate me for I fear you not

I fascinate you because I care a bit not.

I will lead you the way I want to lead

I may hurt you and make you bleed.

You will march readily to my tune

Whether it makes or breaks your fortune.

My journey is your own to make

Laden with success or mistake.

You have to accompany me as long as I want

But you can’t dictate terms whether you rave or rant

All I ask from you is complete surrender

I promise a ride full of amazing splendour.

मोदीजी आपने क्या किया!

(एक गृहणी की व्यथा)
 पति से ऐंठ-ऐंठ कर जो हजार के नोट दाल के डब्बे में दबाये थे,

बबलू की युनिफार्म से बचा पाँच सौ का पत्ता जो साड़ी की तह में छिपाया था,

वो राखी – टिक्के के शगुन, जो शादियों में मिले लिफाफे थे,

इतने सालों से यतन से जोड़े छुट्टे को

पिछले हफ्ते ही हजार के नोटों में तबदील कराया था।

मोदीजी आप ने इक पल में मेरे सपनों पर पानी फेर दिया,

तिल तिल जोड़े तिनकों को बस एक वक्तव्य में बिखेर दिया।
नई साड़ी, नए झुमके सब रद्द हो गए,

मेरी किट्टी की पार्टी के प्लान सारे धरे रह गए।

इन पैसों से हाथ धो बैठूँ गर इन से मैं जिक्र करूँ,

न बोलूँ, तो यह पैसे मिट्टी के मोल ही जाएँगे।

विकट समस्या है गर मैं यह कबूल करूँ,

वर्ना मेरी सारी पूँजी मेरे पति परमेश्वर ले जाएँगे।

सारे पर्स, दराज़ खंगाल कर कुल

तीन सौ बत्तीस रुपए इक्ट्ठा हुए 

दूध भाजी तो आ गई पर गैस वाले 

सिलेंडर बिना दिये ही चलता हुए।

काम वाली बाई ने दो सौ की गुहार की

मेरी मजबूरी जाहिर करने पर

काम पर न आने की धमकी दी।

कल बैंक में लम्बी कतारे होंगी 

एटीएम पर दे मारामारी होगी

दो-चार हजार के लिए अब रोज बैंक के चक्कर लगाओ 

नौकरी – रसोई छोड़ सब अब सौ-सौ के नोट गिनती होंगी।

काले धंधे करने वालों को मोदीजी, आप बेशक धरो

काला धन पकड़ने की यह स्कीम अच्छी है 

तो हम जैसी  गृहणीयों का भी  थोड़ा ध्यान करो।

हमारी सेविंग ब्लैक नही, हमें अपने पैसे खरचने दो।

मोदीजी काश आप इक गृहणी का दुख समझ पाते

पत्नी साथ रहती तो हमारी बात समझ  पाते।
                                  

उनसे मुलाकात 

दिवाली की रात के बाद

बाकि था कुछ नींद का उन्माद

बाहर थी धुएँ की धुंध

और फूटे पटाखों की गंध।

अखबार भी था आज नदारद

फोन और लैपटाॅप को कर रद्द 

 चाय लेकर हम बैठे वहाँ,

गुनगुनी धूप थी जहाँ।

आज रोज की आपा धापी नही थी

काम की अफरा तफरी नही थी

चाय की चुस्कियों के साथ चला,

बातों का अनवरत सिलसिला।

आज जब बातें शुरू हुईं 

तो होती चली गईं

जो पीछे कहीं हम छोड़ आए थे

 जिंदगी की रेस में जो भूल गए थे।

राशन पानी की लिस्ट से,बच्चों की पढ़ाई तक

बिजली,फोन के बिल से, घर के किराये तक

इन सबके बीच में खुद को जो खोया,

आज समय मिला तो फिर से पाया।

बच्चों के बचपन को याद किया

जवानी के उन झगड़ों पर फूटी हँसी 

उन्हें मेरे बालों की सफेदी बढ़ी लगी

मुझे उनके आँखों के नीचे झुर्रियां।

देर तक हम करते रहे बातें 

और बातों से ही निकली कितनी बातें

उनसे इस तरह मुलाकात कर अच्छा लगा

और लगा कि काश खत्म न हों ये बातें।