If only hearts could be like islands
There, but out of reach.
No grief, no sorrow,
No love, no heart break.
Away from ties that bind
And sometimes gag.
Free from associations,
Independent and self contained.
No getting carried away
No trepidation, no uncertainty.
Perhaps, it would be good idea to be isolated!
But then, would it still be called heart?



The other day I heard a voice
Which sounded so familiar
Asking me why I always
look up to others around?
Look inside, it whispered,
Have a look at yourself
Don’t you think you have become
A stranger to yourself?
Why do you seek approval
From others all the time?
If others value your opinion
Why can’t you give approval to self?
Others may be fighting their battles,
Your battles in life are no less.
They may have achieved a lot in life
What you have achieved is no mean feat.
Their lives may be inspiring
Yours may not seem so to you.
But battling illness, disability, penury and adversity
Does not make us all heroes.
The tears shed by them and you
Have same texture and taste.
The sweat on your brow
Is no different than their sweat.
The crosses that we all carry
Are equally burdensome.
Each one of us has to face his/her own demons
And slay them as they come.
Not letting go of your integrity ever
Is what makes you a hero.
Look to thine real self
Whenever plagued with doubt.
You too have fought many battles,
They may not be the trumpeted sort.
Each one of us has to draw
From that inner reserve
Which may not be visible
But is actually always there.
So all my unsung heroes
Never look to others for inspiration
Whatever the situation
You are your own hero.


“Don’t lie,” is parents’ favourite refrain,
Yet they themselves lie all the time.
Lies at the time of school admission,
Lies for leave of absence
Lies and lies and so on it continues.
The torch of small harmless lies,
White lies, egregious lies and all kinds of lies,
Passed from one generation to the other.

We lie to cover our blunders,
Lie to conceal our weaknesses,
Lies to avoid hurting the other,
Lies to cheat on others
And the endless circle of lies goes on.

At times it is a well- rehearsed charade
At others a spontaneous facade
We lie fearlessly as well as with impunity
We also lie after dying a thousand deaths.
At times a lie is our sole life line
At others it slips out without a conscious thought.

Just think what would happen if you stop lying!
Hearts broken, dreams shattered,
Harsh words exchanged and relationships ended.
So don’t ever judge a liar harshly
Lies are the sugar coating
of bitter truth.
If a lie is uttered without malicious intent
A liar is better than an honest man.


Yesterday when you turned the corner, I realised,
A part of me left with you
And you too left something behind.
I have seen your tears, heard your rants and felt your frustrations.
I have no clue of your success.
But drunk on your happiness when you returned home,
I have seen the spring in your step.

You always stopped by when you were burdened
And poured out your anguish to me.
The low marks, not being selected to the football team,
Broken heart and a not so good job,
I have been a witness to all.
I could offer no solace,
You wanted to hear no platitudes,
Your tirade directed against the world
I quietly absorbed.

Today you have a determined air and a mate next to you.
When you turned to look one last time at the house you grew in,
I knew the time has come.
You are leaving for greener pastures.
You will find new friends,
But remember you won’t find anyone like me.

I may be just a milestone on the road
But you often stopped  and vented your feelings sitting on me.
People will come and people will go,
And you will cross many more milestones
But always remember I was a recipient of your secrets
And they will remain buried in me.

The Dark Night

The night was pitch dark
The moon on a holiday.
There was stillness in the park
All quiet after a busy day.
No breeze rustled the leaves
Shadowy trees all around.
No squirrel scurried across the eaves
Not a beetle on the ground.
No cricket chirped in high pitch
Not a soul stirred in the quiet night
This is the night you might see a witch
Who prowls in the dead of the night.

बाल कवितावली


जब मैं घर से चली
सड़क थी सीधी- सीधी
फिर आगे उस में कई
और सड़कें आ मिली।

इक दाएँ मुड़ी
इक बाएँ मुड़ी
एक मेरे पीछे
एक मेरे आगे।

जो उगते सूर्य की ओर जाती है
वह पूर्व दिशा कहलाती है
जो डूबते सूर्य की ओर चली
वह पश्चिम दिशा की ओर चली।

जब पूरब मेरे दायें में
और पश्चिम मेरी बाईं ओर
तब उत्तर मेरे सामने है
और दक्षिण है पीछे की ओर।


जब टिपटिप बूंदें गिरती हैं
तो कितनी अच्छी लगती हैं
पर कोई मुझे बताएगा
बादल में पानी कौन भरता है?

जब सागर का पानी
गर्मी से छू हो जाता है
तो बूंदे बनकर वह
बादल को घर बनाता है
जब बूंदे हो जाती हैं ज्यादा
तो बादल गड़गड़ करते हैं
फिर आपस में टकरा वो
हम सब पर बरसते हैं।

सागर से अम्बर जाए
फिर अम्बर से धरती पर आए
धरती पर झीलों, नदियों में
फिर नदियों से बहे सागर में
बस पानी की यही कहानी
चले जहाँ से, वहीं खत्म कहानी।


तुम रोज़ मुझे देखा करते हो
मैं कभी न एक जैसा दिखूँ
कभी मैं मोटा, कभी मैं छोटा
कभी मैं बिलकुल ही न दिखूँ।

मैं बड़ा शक्तिशाली हूँ
सूरज को मैं कभी ढक लूँ
कभी चांद से लुक्का- छिप्पी
कभी दूँ मैं तारों को पप्पी।

जब मैं काला और मोटा हो जाऊँ
तो झमझम,झमझम बारिश पड़े,
जब मैं सफेद आँचल सा लहराऊँ
तो ठंडी- ठंडी बयार बहे।

मैं जब अपने भाइयों से लड़ूँ
तब बिजलियाँ कड़क जाएँ
और कभी- कभी तो हम मिलकर
तुम पर ओलों की बौछार लाएँ।

मैं मस्त मौला, मतवाला
सारी दुनिया की सैर करूँ
आज यहाँ, कल वहाँ
मैं शहर- शहर घुसपैठ करूँ।

अब मैं चलता हूँ
देर हो रही है
मुझे आज बरसना होगा
फिर मिलूँगा
तुम से आकर
जब तुम्हें भिगोना होगा।


न मम्मी की बिंदी जैसी

न पिंकी की गेंद जैसी

मैं तो हूँ कुछ नारंगी जैसी

बूझो- बूझो मैं हूँ कौन?

सूरज भी है गोल- गोल

और हैं चंदा और मंगल

बाकी के ग्रह भी हैं गोल

गोल है सारा सौर मंडल।

अगर तुम निकल पड़ोगे पैदल

और चलोगे सीधे- सीधे

तो एक दिन वहीं पहुँचोगे

चले थे जहाँ से इस पथ पे।

मैं नीला ग्रह कहलाती

जीवन सिर्फ़ मुझ पर पनपता

पानी तो है जीवनदायी

मैं हूँ तुम्हारी अपनी धरती।

नानी को सिखाई ई मेल

मेरी नानी, प्यारी नानी सबसे है निराली

जन्म से लेकर अब तक सुलझाई मेरी हर पहेली

आपने हर चीज उंगली पकड़ सिखाई है

कितनी ही कहानियाँ आपने अब तक हमें सुनाईं हैं।

पर नानी आज मैं आपको सिखाऊँगा

ई मेल कैसे करते हैं, मैं आपको बताऊँगा

मामा को जो चिट्ठी तुम लिखतीं,पंद्रह दिन में मिलती है

पर ई मेल तो झट से ही अमरीका जा पहुँती है।

जैसे आप कलम से लिखतीं

बस वैसे ही उँगलियों से बटन चलाने हैं

खत खत्म होते ही सेंड का बटन दबाना है।

जैसे ही इसे आपने सेंड किया

अमरीका में मामा ने रिसीव किया

इस तरह से आपका खत तुरंत पहुँचे

और आपका हाल सुनाए

सब सकुशल है पढ़ मामा खुश हो जाएँ।

देखो इतना आसान ई मेल भेज पाना है

जब मैं वापिस जाउँगा तो मुझे भी मेल करना

नानी आपसे सीखा बहुत कुछ यह माना,

पर ई मेल करना, आपको मैंने ही सिखाया है।


रेगिस्तान में होता तंबू

आर्टिक में ईगलू

बाँस के घर होते कहीं

तो होते शिकारे कहीं

कैरावान में भी रहते लोग

और रहते मचानों में

भाँति- भाँति के घर होते हैं

हर जगह इस दुनिया में।

गाँव में होते कच्चे घर

शहर में पक्के मकान

कोई आलिशान बंगले में रहता

तो कोई गगनचुम्बी इमारत में

किसी को भाये ताड़ की कुटिया

तो कोई रहे महलों किलों में।

दुनिया भर में हो चाहे ही

कितने ही न्यारे घर

सबका मन लगे अपने घर में ही

क्योंकि घर है आखिर घर

चाहे छोटा हो या बड़ा

अपना घर सबसे भला।


चिंटू बोला मम्मी से एक दिन
अब मैं बड़ा हो गया हूँ
कभी कहती हो माचिस न जलाना
कभी कहती चाकू न उठाना
कभी होती इस्तरी गरम
तो कभी गैस पर भगौना गरम!

बाजार अकेले न जाओ
सड़क अकेले न पार करो
सीढ़ियों पर मत भागो
लिफ्ट में अकेले न चढ़ा करो।
मम्मी हर बात में यह मत
वह मत न करा करो।
माना आपसे छोटा हूँ,
पर अब मैं बड़ा हो रहा हूँ।

काम कैसे – कैसे

मुझे बड़े हो पापा नही बनना
न ही माँ का काम सुहाए
सोचती हूँ कुछ ऐसा करूँ
जो आराम से हो जाए।

पापा मेरे हैं डाॅक्टर
सारा दिन बस काम
माँ जाए बैंक सुबह – सुबह
काम करते हो जाए शाम।

मिस्त्री सारा दिन धूप में तपते
और किसान खेतों में थकते
डाकिया घर- घर में जाता
दर्जी कपड़े सिलता रहता।

मोची, सिपाही या फिर टीचर
सब मेहनत करते डटकर
बढ़ई, पायलट हो या अफसर
काम से कोई न निकले बचकर।

मैं तो छोटी सी बच्ची हूँ
इतनी मेहनत न कर पाऊँगी
सोचती हूँ एक गाड़ी लेकर
मैं तो टैक्सी ही चलाऊँगी।

जब मन किया काम करूँगी
बाकी समय आराम करूँगी
इस में है बहुत आराम भाई
मैं तो बड़ी हो ड्राइवर ही बनूँगी।


हुर्र हुर्र काका ने कहा और बैलों को हांका
हम भाग पड़े बैलगाड़ी ओर, ट्रेन को किया टाटा
टन- टन बैलों ने सिर हिला गले पड़ी घंटी बजाई
ननिहाल की तरफ चल दिए हम दोनों बहन- भाई।
हरे- हरे खेत चारों ओर, पेड़ों की ठंडी छाँव
ठुमक- ठुमक कर बैल चलें, हम बैठ हिलाते पाँव।
बैलगाड़ी की सवारी है भैया सबसे निराली
न तेल, न बिजली यह गाड़ी बड़ी मतवाली।
बस हौले- हौले हिचकोले खाती
यह गाड़ी हमें ननिहाल पहुँचाती।
तुम भी जब करो गाँव जाने की तैयारी
एक बार जरूर करना बैलगाड़ी की सवारी।

The Profoundity of Being Absurd

Why should we always be serious?
Why ever banter is not taken seriously?
Must we weigh all our words?
And present our thoughts ponderously?
Why is light heartedness dismissed away?
Is being profound the order of the day?
Laughter is tom-tomed as the best medicine
But laughing without reason, termed asinine!
Making people laugh is not considered serious business
Intelligence is measured only by seriousness.
Must we always spout homilies?
And deride those who propound absurdities?
Making fun of self is not that easy
But when you do so, you’re labelled breezy!
Life is full of steep ups and deep downs
So shouldn’t we try to swim rather than drown?
Hope and laughter keep us afloat
Let’s be absurd now and then
And not with self importance bloat.


यह whatsapp तो इक दिन लेगा मेरी जान
सारे काम छोड़, बन बैठी इसकी गुलाम
पति हैं हैरान  और बच्चे भी परेशान
किस आफत से हो गयी मेरी दुआ  सलाम।

सुबह उठते ही फोन, रात को सोने से पहले फोन
हर एक घंटे फोन  में झाँकू, क्या  पता  दूसरी ओर हो कौन?
अब तो न मन कहीं और रमे, न कोई ध्यान
यही मेरा परमेश्वर और यही मेरा भगवान।

मैंने सोचा था कुछ दिन में यह थम जाएगा
पहला खुमार  उतर जाएगा
पर ज्यों ज्यों समय बढ़ता  गया
मर्ज और  भी गहराता गया
इक नशा सा इसका रहता
किसने क्या लिखा मन सोचता
कुछ  नया पढ़ने  की उत्सुकता
वाह वाह सुनने को मन ललकता।

ग्रुप  में बाते यहीं होती हैं
भाई से मुलाकातें यहीं होती हैं
सहेलियों से भी गपशप यहीं
और राशन भी whatsapp पर ही।

आज मन कड़ा  कर बैठी
फोन को हाथ लगाउँगी नहीं
फिर सोचा, यह कविता भी तो डालनी है
सबकी प्रतिक्रिया  भी तो देखनी है
तो अब कल से फोन से तौबा
और whatsapp?तौबा तौबा!!