मैं कैसे शीश निवाऊँ

जहाँ धर्मनिरपेक्षता सिर्फ़ इक नारा हो
हिंदू मुस्लिम में न भाईचारा हो
जहाँ सिक्ख इसाई असुरक्षित हों
और धर्म के नाम पर दंगे हों
मैं कैसे शीश निवाऊँ उस देश को,
कैसे शीश निवाऊँ?

जहाँ वैचारिक मतभेद की जगह न हो
दूसरे का पक्ष सुनने की मंशा न हो
जहाँ जो श्वेत नही वो सिर्फ़ श्याम ही हो
और हर विपक्षी बस देशद्रोही हो
मैं कैसे शीश निवाऊँ उस देश को,
कैसे शीश निवाऊँ?

जहाँ सत्य की कोई  कीमत ही न हो
जहाँ शिक्षा हर किसी को मुहैया न हो
जहाँ स्वच्छता जन जन को सिखानी पड़े
और आरक्षण की कोई सीमा न हो
मैं कैसे शीश निवाऊँ उस देश को,
कैसे शीश निवाऊँ?

जहाँ बेटी कोख में ही मारी जाए
जहाँ खाप पंचायत करे न्याय
जहाँ शोषित को प्रताड़ित किया जाए
और नारी को पीटा, फिर पूजा  जाए
मैं कैसे शीश निवाऊँ उस देश को,
कैसे शीश निवाऊँ?

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Adieu Winter!

Holi always leaves me sad in its wake
It makes me long for winter that’s gone by
Spring is gone before you can say hello
And now long sweltering summer is coming by.

I miss the way kids would snuggle up to me
And the spontaneous cuddles of their father
The warmth of the quilts engulfing me
And retiring with my favourite book next to the heater.

The endless cups of coffee and tea
The hot soups and ghee soaked goodies
And gorging on all that’s sweet and yummy
Its the season of fulfillment for all the foodies.

The spirit of Christmas, of loving and forgiving
I long for the short days and long drawn nights
A nip during the day, but the nights never freezing
Its the thought of summers which gives me frights.

Alas! Change is the only constant
So as I pack my woolies and put them away
And caress my beloved shawl one last instant
I console myself if summer is here, winter’s not far away.

Farewell my favourite season
It is a long separation
But you are the very reason
Summer I’ll bear with toleration.

साया

कल अचानक जब पलट कर देखा
तो पाया
हमेशा मेरे पीछे चलनेवाला
कहीं खो गया चलते चलते
विस्मित,चकित और भ्रमित मैं
ढूँढू उसे ऊपर नीचे
पर उसका न कोई पता लगा
मैं पूूछूँ किस किससे?
जब से होश संभाली
उसे पाया अपने संग
कभी वह मुझसे बड़ा हो जाता
और कभी बिलकुल छोटा
बचपन में हम कई खेल हैं खेले
मेरे सुख दुख का वो साथी
न जाने कब हो गया अलग।
आगे  बढ़ते बढ़ते
कभी न देखा उसे पलट के
बस लक्ष्य पर टिकी थी आँखें
समय नही था कि कुछ देर तो बैठे
इसी भागदौड़ में छूट गया साया
और अपने को अकेला पाया।
इन्ही  सोचों में डूबी  हुई थी
कि भागते भागते बेटा आया
और बोला,
‘माँ  देखो मेरे पीछे  कौन खड़ा है
मैं जो करूँ,यह वही करे है
यह तो मेरे,साथ चले है
माँ  यह मेरा कौन है?’
मैं बोली ‘यह तेरा है साया
कोई तेरे साथ रहे न रहे
यह सदैव तेरा साथ देगा
तेरे पीछे-पीछे यह चलेगा
मैं रहूँ  या न रहूँ
यह सदा तेरा ही रहेगा’।

Daddy Dearest

Too long I had held my grudge against you.

The unshed tears clouding my vision

Your virtues eclipsed by that one vice

But today I have rid self of confusion

How could I turn a blind eye and let it demonize?

With age comes wisdom and with wisdom realisation,

Even gods I have discovered have feet of clay

Dad, you were just a man, all heart I can say.

As I sit down to record my time with you

Its the memories of good times that shine through.

Being orphaned as a toddler and denied parental care

You lavished love on us,never raised a finger

With four kids to raise, you taught us that love is to share

And never allow the bitterness of having too less to linger.

You denied us nothing, overlooked bad grades

You taught love is unconditional with no expiry date.

I so remember those mobike rides when the rest of the family was away

You would ask me to sing out loud and hold you tight

So that you knew I was awake and had not fallen off on the way,

And cuddle me to sleep in the deep of the night.

Your off centre rotis and clumsy attempts at tying my hair

Dad these are the memories that with my kids I share.

But most precious is what mom had once told

When you refused to let go off me, the third daughter in a row.

If I may make a claim so bold

I think I was your favourite, my siblings won’t agree though.

My love for movies and reading books

Laughter as medicine to counter sorrows in life

Was all nurtured under your benign look

You taught me how to actually live this life.

 

For every thing can’t be measured by success alone.

You gave us wings, you let us be

When we fell we got up on our own

I can’t recall any restrictions on me.

I remember your love, I remember the joy and more

I also prefer to forget the dark days of yore

If I have to live this life once more,

I would like to have you my dad all the more.

 

 

 

 

 

हाँ, मैं बेवा हूँ।

तुम जैसे काम पे जाते हो

वह भी वैसे जाता था

फर्क इतना  तुम दफ्तर  जाते

और वह सरहद पर जाता था।

 

काम तुम्हारी पूजा  हो न हो

उसको न कोई दूजा काम सुहाता था।

तुम घर आते  काम छोड़ कर

वह घर छोड़ काम पर जाता था।

तुम लैपटॅाप कंधे  पर टाँगते

वह अपनी दोनली सीने  से लगाता था।

 

 

जब भी वह छुटटी  पर घर आता

उन्मुक्त ठहाकों से घर जगमगाता

तोहफ़ों और गानों से घर भर देता

पिछली छुटटी  मेरी कोख  भर गया।

फिर छुटटी  पर आने का वादा कर

मेरे माथे  पर बोसा दे गया।

 

मैं उस नन्ही कली के आने की तैयारी  में जुट गई थी

जब मुझ पर गाज  गिरी कि माँ बनने से पहले मैं तो बेवा हो गई थी।

मुझे  आज भी रंजिश  इस बात की

मुझे शोक  भी किसी ने मनाने दिया

आने वाली का वास्ता दे,

मेरे आँसुओं को न बहने दिया।

 

तुम तो शिश नवा कर अपनी राह पर चल दिये

देश भी एक तमग़ा  देकर फिर राजनीति  में उलझ  गया

जात धर्म की लड़ाई में तुम फिर मशगूल  हो जाओगे

अगले साल उसकी समाधि पर इक फूल रख जाओगे।

तुम्हें  महफूज़ रखने की कीमत मैं तिल तिल जल चुकाती हूँ

पहले सिपाही की बीवी, अब बेवा  उसकी कहलाती  हूँ।

 

कल जब वह नन्ही परी इस दुनिया में आएगी

बिन बाप की बच्ची  ताउम्र  वह कहलाएगी।

कौन उसकी उंगली  पकड़ पईंयाँ पईंयाँ चलना सिखायेगा

कौन उसे हवा में उछाल  उसकी किलकारी  सुनायेगा

किसको वह कल बाबा कहकर पुकारेगी

कौन उसे लाडो कह कर सीने से लगायेगा?

 

सब काम मेरे जिम्मे छोड़कर

वह तो शहीद  हो गया।

क्या मुझे इस अकेलेपन का भी

कोई तमगा देगा?

अगर कुछ कर सको तो

किसी और को बेवा न होने दो।

Exams

Exam, exam ka shor macha kar
Papa itna kyon daraate ho?
Apna time bhul kar
Mujh ko tension dilaate ho!

Padh hi to rahi hoon main
Din raat ek karke
Uss examiner ko koi samajha de
Number de khule haath karke.
Prarthna karo ki apni biwi se daant kha kar na aaya ho
Na hi uss bechari ki saas ne usko tanna koi maara ho.

Par ek baat batao papa,
In subjects ka kya matlab hai?
Bhugol gol hai bilkul mera
Aur gul hai civics
Gannit mein ginti ke alawa hum aur kuch kyon hain padhte?
Kyonkar padhna padhta hai  haye mujhko physics?
Papa, kya aap bhi bio se ghabrate the?
Poems ke itne matlab, kya poet ko khud pata hote?

Phir yehi soch kar himmat milti hai
Mere jaisi bhi kai honge
Papa, apni baat na bhoolna!
“Numberon mein kya dhara hai”
Number chahe jaise bhi aaye
Koshish mein na hai koi kami
Aaj ka paper bas ho gaya hai
Mummy se kehna dikhayen thodi narmi.

ये पति

पत्नी को उत्पीड़ित करने वाले
खुद को पीड़ित बतलाते हैं!
माँ और पत्नी बीच रेफरी खेल-खेल
खुद को ये फुटबाल सा पाते हैं।

बचपन माँ के पल्लू तले काटा
बड़े  होकर भी न उसे छोड़ पाए
जब बीवी घर आई तो क्या करें
इसी दुविधा में अब खुद को पाएँ।

माँ का लाड़ और पत्नी का प्यार
इनके सिर पर लटके दोधारी तलवार
एक खुश है तो, दूजी नाराज़
इनकी तो बंद हो गई आवाज़।

अब सोचो इन पर क्या गुज़रे
जब हो सास का घर आगमन
रस्सी ढूँढे लटकाने को खुद
जब करना पड़े अग्नि  शमन।

त्रासित पति की गाथा
बेहद दुखदायी है
बहनों इन पर मत हँसो
यह स्थिति  इन की
इन्होंने ही बनाई है।